मुलताई:पानी की तलाश में शहर के बीच गुरूद्वारा पहुंचा चीतल, दरवाजे से टककाकर हुआ घायल

 बैतूल मीडिया || क्षेत्र में भीषण गर्मी से सूखते जलस्त्रोत एवं कम होते पानी से अब वन्य प्राणी शहर की ओर भटककर आ रहे हैं। वहीं लाकडाऊन होने के कारण सभी जगह शांति एवं लोग नजर नही आने से भी वन्य प्राणी शहर की ओर रूख कर रहे हैं। ऐसा ही मामला तब सामने आया जब एक चीतल मुख्य मार्ग से होता हुआ तेजी से आकर गुरूद्वारा पहुंच गया और गेट से टकराकर घायल भी हो गया।

सुबह मुख्य मार्ग सूरजमल स्मृति तिराहे पर बेरिकेट्स के पास पुलिस वाहनों की जांच कर रही थी इसी दौरान एक वन्य प्राणी तेजी से बेरिकेट्स लांघता हुआ गुरूद्वारा में जा घुसा। इस दौरान हड़बड़ाहट में वन्य प्राणी गुरूद्वारा के लोहे के गेट से टकराकर घायल भी हो गया। अचानक हुई इस घटना से वहां मौजूद हर कोई भौंचक्का रह गया तथा किसी के समझ नही आया कि आखिर वह कौन सा वन्य प्राणी था। वहां मौजूद चिन्टू खन्नाा, योगेश अग्रवाल आदि ने देखा कि वन्य प्राणी चीतल है जो घायल होकर हाल में घूम रहा है। उन्होंने तत्काल पुलिस की सहायता से हिरण को भारी मशक्कत के बाद पकड़ा तथा वन विभाग को इसकी सूचना दी। इधर वन विभाग के कर्मचारियों ने मौके पर पहुंचकर डायल 100 की मदद से घायल हिरण को पशु चिकित्सालय ले जाकर उसका उपचार कराया गया।

लाक डाऊन में हलचल नही होने से वन्य प्राणी सक्रियः

पूरे मामले में वन विभाग के रेंजर अमित साहू ने बताया कि लाक डाऊन लगने से ग्रामीण अंचल सहित नगर में भी शांति ही शांति नजर आ रही है लोग घरों में हैं इसलिए वन्य प्राणियों को कोई हलचल नही लग रही है इसलिए वे बेखौफ होकर शहर तक आ रहे हैं। उन्होने बताया कि पिछले वर्ष भी लाक डाऊन में नगर सहित ग्रामीण अंचलों में बड़ी संख्या में वन्य प्राणियों की दस्तक हुई थी। इस वर्ष भी फिलहाल सभी जगह शांति होने से वन्य प्राणी शहर की ओर रूख कर रहे हैं। उन्होने बताया कि इस वर्ष जंगलों में भी पानी की किल्लत नही है इसलिए पानी के कारण नहीं वरन लाक डाऊन के कारण वन्य प्राणी शहर की ओर आ रहे हैं।

जंगल में सरपट भागा चीतलः

गुरूद्वारे के लोहे के गेट से टकराकर घायल हुए चीतल के संबन्ध में रेंजर साहू ने बताया कि चीतल को मात्र हल्की खरोंच आई थी जिसका उपचार करा के उसे जंगल में छोड़ा गया। जैसे ही चीतल को छोड़ा वह तेजी से जंगल में जाकर ओझल हो गया। उन्होने बताया कि वन्य प्राणियों की हल्की चोटें स्वतः ही ठीक हो जाती है, यदि उन्हे हम ज्यादा हाथ लगाते हैं तो एैसे में भी उनकी मौत हो सकती है इसलिए उपचार कराने के तत्काल बाद चीतल को वन में छोड़ दिया गया।

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